प्रेम कभी तृप्त नहीं करता....
*प्रेम तृप्त नहीं करता**
साधारणत: प्रेम तृप्त नहीं करता, और अतृप्त कर जाता है
कौन पति किस पत्नी से तृप्त हुआ है
या कौन पत्नी किस पति से तृप्त हुई है
या कौन मां किस बेटे से तृप्त हुई है
कौन मित्र किस मित्र से तृप्त है
कारण पूछो। क्या कारण है?
संसार में सभी लोग प्रेम करते हैं और अतृप्ति का ही अनुभव होता है
कहीं तृप्ति नहीं होती
क्योंकि प्रेम की जो खोज है, वह परमात्मा से ही तृप्त हो सकती है
तुमने किसी को प्रेम किया, प्रेम करते ही तुम्हारी जो आकांक्षा होती है गहरे में वह यह होती है कि यह व्यक्ति परमात्मा जैसा हो
वह सिद्ध नहीं होता परमात्मा जैसा, इसलिए अतृप्ति रह जाती है
बेस्वाद हो जाता है मन, तिक्त हो जाता है
तुम जब किसी व्यक्ति को प्रेम करते हो तो तुमने देखा कि तुम्हारी आकांक्षा होती है, इससे सुंदर और कोई न हो, इससे श्रेष्ठ कोई और न हो, इससे सत्यतर कोई और न हो
तुमने परमात्मा की मांग कर ली
तुमने सत्यम् शिवम् सौंदर्यम् कों मांग लिया।
और निश्चित ही कोई व्यक्ति इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता, तो धीरे — धीरे प्रेमी हताश हो जाता है
वह कहता है कि नहीं, गलत जगह मांग लिया
अमृत पीने गये थे और जो पीआ तो पता चलता है कि अमृत तो कुछ भी नहीं है, जहर सिद्ध होता है
फिर मन उचाट हो जाता है
फिर भागा— भागा, फिर कहीं और, किसी और जगह, किसी और प्रेम में पड़ जाए, वहां खोज लें—ऐसा जन्मों—जन्मों तक मन का पक्षी उड़ता है
नये —नये स्थानों पर बैठता है
एक सूफी फकीर को एक सम्राट मिलने आया
सम्राट बहुत दिन से उत्सुक था मिलने को इस फकीर से
और कई बार संदेशा भी भेजा था कि तुम आओ
लेकिन फकीर कहता है कि मिलने को अगर तुम उत्सुक हो तो तुम्हीं आओ
मेरे आने से चूक हो जाएगी
आने को मैं आ सकता हूं लेकिन सार न होगा
क्योंकि जिज्ञासु जब आता है तो उसके आने में ही जिज्ञासा सघन होती है, प्रगट होती है
तुम इतना तो मूल्य चुकाओ
तो अंततः सम्राट को आना पड़ा
वह जब आया तो फकीर की झोपडी पर फकीर नहीं था, उसकी पत्नी थी
उसने कहा, आप बैठें, आप विराजे, मैं उन्हें बुला लाती हूं, वे पीछे खेत पर काम करने गये हैं
तो सम्राट ने कहा कि ठीक है, तुम बुला लाओ; सम्राट वहीं टहलने लगा
उसकी पत्नी ने फिर कहा कि आप आए, हमारे धन्यभाग
पर बैठें तो। उसने एक फटी—पुरानी दरी बिछा दी कि आप विराजे!
लेकिन सम्राट ने कहा कि मैं टहलूंगा, तू बुला ला पति को
वह बड़ी दुखी होकर पति के पास गयी, उसने पति को रास्ते पर कहा कि सम्राट कुछ अजीब है मैंने बार—बार कहा कि बैठें, विराजे, दरी भी बिछा दी, मगर वह बैठता नहीं
फकीर हंसने लगा
उसने कहा कि वह दरी उसके बैठने योग्य नहीं
उसके बैठने योग्य जगह होगी तभी बैठेगा
तुमने बहुत जगह मन के पंछी को बिठाने की कोशिश की, वह बैठ नहीं पाया
प्रेम का पक्षी बहुत स्थानों पर बैठा, बैठ नहीं पाया, उठ—उठ आता है
उसके योग्य जगह नहीं मिलती
उसके योग्य जगह तो परमात्मा ही है
जब भी तुम प्रेम में पड़े तुम परमात्मा के ही प्रेम में पड़े, लेकिन शायद तुमने ज्यादा की मांग कर ली बहुत थोड़े से
अब किसी स्त्री से या किसी पुरुष से तुम परम सौंदर्य की मांग करो तो भूल हो जाएगी
या परम सत्य की, या परम श्रेयस की
परम की मांग तो परमात्मा से ही हो सकती है
तुमने इधर—उधर माग की तो मांग पूरी न होगी तो तुम अतृप्त हो जाओगे
तो बेस्वाद हो जाएगा मन, कडुवा हो जाएगा, तिक्त हो जाएगा
फिर तुम प्रेमपात्र बदलते रहोगे
हम इसीलिए तो कभी प्रेम में तृप्त नहीं हो पाते
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